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छत्तीसगढ़ प्रदेश का एक विश्वसनीय न्यूज पोर्टल है, जिसकी स्थापना देश एवं प्रदेश के प्रमुख विषयों और खबरों को सही तथ्यों के साथ आमजनों तक पहुंचाने के उद्देश्य से की गई है।
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नई दृष्टिबिंदु / नईदिल्ली चुनाव आयोग के भीतर मतभेद को लेकर इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के बीच पिछले 10 महीनों में वोटर लिस्ट के सेंट्रलाइजेशन, एउक ठी३ सॉफ्टवेयर और फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर 14 बार लिखित असहमति दर्ज हुई है।
फॉर्म-6 में बदलाव पर सवाल
रिपोर्ट में कहा गया है कि नए मतदाता पंजीकरण के फॉर्म-6 में एक नया सवाल जोड़ा गया है, जिसमें आवेदक से पूछा जाता है कि क्या उसका या उसके माता-पिता/दादा-दादी का नाम पिछली रकफ की वोटर लिस्ट में था। चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और एसएस संधू ने फाइल नोट में इसे फीॅ्र२३१ं३्रङ्मल्ल ङ्मा ए’ीू३ङ्म१२ फ४’ी२, 1960 में संशोधन के बिना किया गया बदलाव बताते हुए अवैध और गैरकानूनी करार दिया और हटाने की मांग की। इसके बावजूद यह सवाल फॉर्म में बना हुआ है।
एउक ठी३ और सेंट्रलाइज्ड सिस्टम पर विवाद
22 जनवरी 2026 को लॉन्च हुए एउक ठी३ प्लेटफॉर्म के तहत करीब 1 अरब मतदाताओं का डेटा और 40 से अधिक ऐप्स को सेंट्रलाइज किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक इस सेंट्रलाइजेशन के बाद स्थानीय स्तर के वैधानिक अधिकारियों एफड२ (जो आमतौर पर रऊट स्तर के होते हैं) का पोर्टल पर एक्सेस सीमित कर दिया गया।
गोवा का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कई मामलों में एफड द्वारा पात्रता और दस्तावेज सही पाए जाने के बाद भी सेंट्रल सिस्टम की तकनीकी बाधा के कारण नाम फाइनल रोल में शामिल नहीं हो सके।
कैबिनेट सचिव को पत्र और फैसले को रद्द करना
विवाद बढ़ने पर चुनाव आयुक्त संधू और जोशी ने कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन को पत्र लिखकर आयोग के कुछ प्रशासनिक फैसलों को नियमों के खिलाफ बताया। रिपोर्ट के अनुसार दोनों आयुक्तों ने एक फैसले को रद्द भी किया और इसकी जानकारी उएउ को दी।
पश्चिम बंगाल में 16 हजार अपीलों का मामला
रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल का जिक्र भी है, जहां न्यायिक अधिकारियों द्वारा जोड़े गए मतदाताओं के खिलाफ करीब 16,000 अपीलें दायर की गईं। चुनाव आयुक्त संधू ने सवाल उठाया कि ये अपीलें किसके आदेश पर और किसकी अनुमति से दायर हुईं, क्योंकि इसकी जानकारी उएड और अन्य आयुक्तों को भी नहीं थी।
चुनाव आयोग का पक्ष
विवाद के बाद चुनाव आयोग की ओर से जारी प्रेस नोट में कहा गया कि आयोग के भीतर अलग-अलग विचार आना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है और सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। तकनीकी विंग ने एउक ठी३ को सुरक्षा और पारदर्शिता बढ़ाने वाला कदम बताया है। वहीं विपक्षी दलों ने इस रिपोर्ट को आधार बनाकर आयोग की स्वायत्तता और कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। यह पूरा घटनाक्रम भारतीय चुनाव आयोग के इतिहास में अभूतपूर्व माना जा रहा है, क्योंकि आमतौर पर आयोग के अंदरूनी मतभेद सार्वजनिक नहीं होते।