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छत्तीसगढ़ प्रदेश का एक विश्वसनीय न्यूज पोर्टल है, जिसकी स्थापना देश एवं प्रदेश के प्रमुख विषयों और खबरों को सही तथ्यों के साथ आमजनों तक पहुंचाने के उद्देश्य से की गई है।
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(यतेन्द्र जीत सिंह “छोटू”: ब्यूरो चीफ जिला खैरागढ़ )
खैरागढ़ : एशिया के एक नाममात्र राजकुमारी इंदिरा सिंह कला और संगीत विश्वविद्यालय के रूप में पहचान रखने वाले खैरागढ़ स्थित राजकुमारी इन्दिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय का 70वां स्थापना दिवस मंगलवार 13 अक्टूबर 2026 को धूमधाम से मनाया जाएगा।। स्थापना दिवस के अवसर पर विश्वविद्यालय परिसर में शास्त्रीय संगीत, कथक और छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिलेगा।।
कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रामेन डेका मुख्य अतिथि होंगे।।वहीं उपमुख्यमंत्री अरुण साव, राजनांदगांव लोकसभा क्षेत्र के सांसद संतोष पांडेय, खैरागढ़ विधायक यशोदा नीलाम्बर वर्मा तथा विश्वविद्यालय के संस्थापक सदस्य राजा आर्यव्रत सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल होंगे 87 वां कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा के संरक्षण में आयोजित यह समारोह विश्वविद्यालय की सात दशक लंबी कला-साधना, संगीत शिक्षा और सांस्कृतिक विरासत को रेखांकित करेगा।। कार्यक्रम शाम पांच बजे डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा प्रेक्षागृह, परिसर क्रमांक-2 में आयोजित होगा।।
पिता ने विश्वविद्यालय में दी थी संगीत की शिक्षा, अब पुत्र देंगे सितार वादन की प्रस्तुति
स्थापना दिवस समारोह का खास आकर्षण मुंबई के सितार वादक जुनैन हलीम जाफर खान की प्रस्तुति होगी।। वे प्रख्यात सितार वादक उस्ताद हलीम जाफर खान के पुत्र एवं शिष्य हैं।। उस्ताद हलीम जाफर खान भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रतिष्ठित कलाकार और सितार वादन की विशिष्ट जाफरखानी शैली के प्रवर्तक थे। विश्वविद्यालय से उनका पुराना संबंध भी रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 1980 के दशक में तत्कालीन कुलपति अरुण कुमार सेन के कार्यकाल के दौरान उन्होंने लगभग तीन महीने तक इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में अतिथि व्याख्याता के रूप में सेवाएं दी थीं। ऐसे में उनके पुत्र जुनैन हलीम जाफर खान की प्रस्तुति विश्वविद्यालय के साथ जुड़ी इस पुरानी संगीत परंपरा की यादों को भी ताजा करेगी। जुनैन अपने पिता से प्राप्त संगीत-साधना और सितार वादन की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी प्रस्तुति में भारतीय शास्त्रीय संगीत की राग परंपरा और सितार के सुरों की बारीकियां सुनने को मिलेंगी।।
विदुषी सुचित्रा हरमलकर की कथक प्रस्तुति में दिखेगी शास्त्रीय नृत्य की गरिमा
समारोह में इंदौर की विदुषी सुचित्रा हरमलकर कथक नृत्य की प्रस्तुति देंगी।। वे कथक की प्रतिष्ठित कलाकार, नृत्य गुरु और शिक्षाविद् के रूप में जानी जाती हैं।। विश्वविद्यालय के साथ उनका भी अकादमिक और कलात्मक जुड़ाव रहा है।। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वे यहां विशेषज्ञ के रूप में कार्यशाला एवं वर्कशॉप-सह-सेमिनार संबंधी गतिविधियों में अपनी सहभागिता और प्रस्तुति दे चुकी हैं।। उनकी कथक साधना में लय, भाव, पद-संचालन और शास्त्रीय नृत्य की पारंपरिक बारीकियों का विशेष महत्व है।। स्थापना दिवस पर उनकी प्रस्तुति विद्यार्थियों और कला प्रेमियों के लिए शास्त्रीय नृत्य की परंपरा को करीब से समझने का अवसर होगी।।
पद्मश्री डॉ राधेश्याम बारले के पंथी नृत्य से झलकेगी छत्तीसगढ़ की पहचान
समारोह का एक प्रमुख आकर्षण पद्मश्री सम्मानित डॉ. राधेश्याम बारले एवं उनके समूह की पंथी नृत्य प्रस्तुति होगी। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के ग्राम खोला में जन्मे डॉ. बारले ने पंथी नृत्य को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।। वर्ष 2021 में उन्हें कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया।। उन्होंने एमबीबीएस की पढ़ाई के साथ खैरागढ़ स्थित इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय से लोकसंगीत में डिप्लोमा भी प्राप्त किया है।। उनकी कला साधना बाबा गुरु घासीदास के संदेशों, सतनाम परंपरा और छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने से जुड़ी रही है।। पंथी नृत्य में पारंपरिक गीत, मांदर की थाप, सामूहिक नृत्य और आध्यात्मिक संदेश का अनूठा मेल देखने को मिलता है।। उनके समूह की प्रस्तुति स्थापना दिवस समारोह को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान से जोड़ेगी।।
सात दशक की संगीत साधना का प्रतीक है खैरागढ़ विश्वविद्यालय
बुधवार 14 अक्टूबर 1956 को स्थापित यह विश्वविद्यालय भारतीय शास्त्रीय संगीत और प्रदर्शनकारी कलाओं की शिक्षा के लिए देश-विदेश में अपनी अलग पहचान रखता है।। संगीत, नृत्य, लोककलाओं और ललित कलाओं की अकादमिक शिक्षा के माध्यम से संस्थान ने कई पीढ़ियों के कलाकारों को मंच प्रदान किया है।। विश्वविद्यालय की पहचान केवल एक शिक्षण संस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खैरागढ़ की सांस्कृतिक विरासत और छत्तीसगढ़ की कलात्मक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र भी है। स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित यह सांस्कृतिक संध्या शास्त्रीय संगीत की गुरु-शिष्य परंपरा, कथक की समृद्ध विरासत और छत्तीसगढ़ के लोकनृत्य को एक ही मंच पर प्रस्तुत करेगी।।