डॉ. अजय आर्य की काव्य कृति ‘मुझको भी जीने की वजह दे दे’ का लोकार्पण


प्रेम सिर्फ इंसानी नहीं, प्रकृति में भी समाया है: डॉ. एम. एम. त्रिपाठी

साहित्य, संवेदना और आत्मबोध से परिपूर्ण वातावरण में अध्यक्ष डॉ. एम. एम. त्रिपाठी के कर-कमलों से प्रख्यात साहित्यकार डॉ. अजय आर्य की नवीन काव्यकृति ‘मुझको भी जीने की वजह दे दे’ का लोकार्पण सम्पन्न हुआ।यह आयोजन मात्र पुस्तक विमोचन न होकर प्रेम, प्रकृति और मनुष्य के अंतर्मन पर केंद्रित सार्थक संवाद का मंच बना।कार्यक्रम में साहित्य और मानवीय मूल्यों की भूमिका को रेखांकित करते हुए रचनात्मक लेखन की सामाजिक उपयोगिता पर बल दिया गया।

अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. एम. एम. त्रिपाठी ने कहा कि प्रेम केवल मानवीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह प्रकृति में भी व्याप्त है।उन्होंने नदियों के उदाहरण से प्रेम की गहराई और जटिलता को समझाते हुए कहा कि प्रेम प्रकृति, स्वभाव और आत्मबोध का रूप है। उनके अनुसार डॉ. अजय आर्य की यह कृति पाठक को ठहरकर स्वयं को देखने और समझने का अवसर देती है।

संस्कृत की विदुषी अनुपमा उपाध्याय ने संक्षेप में कहा कि प्रेम सृष्टि का मूल तत्व है और जब साहित्य उसे संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है तो वह पाठक के जीवन का हिस्सा बन जाता है।यह कृति मनुष्य और प्रकृति के सूक्ष्म संबंधों को उजागर करती है।

लेखक डॉ. अजय आर्य ने कहा कि उनकी यह काव्यकृति प्रेम और बिछोह दोनों भावों को समेटे हुए है।उनके अनुसार प्रेम केवल मिलन नहीं, बल्कि स्मृति, प्रतीक्षा और स्वीकार भी है, और यही इस संग्रह की आत्मा है।
कार्यक्रम में जसविंदर कौर ने कृति को नारी संवेदना, आत्मसम्मान और आंतरिक पीड़ा की सशक्त अभिव्यक्ति बताया, जबकि अनुपमा उपाध्याय ने इसे प्रेम और जीवन की अनिवार्यता को स्वर देने वाली रचना कहा।
प्राचार्य दुष्यंत कुमार, उपप्राचार्य अदिति शर्मा ने इसे आत्मसंवाद और आत्मसंयम की प्रेरक रचना बताते हुए लेखक को बधाई दी।विभिन्न विभागाध्यक्षों एवं शिक्षकों ने लेखक को बधाई देते हुए कृति को समय की संवेदनशील आवश्यकता बताया।
इस अवसर पर प्रधानाध्यापिका अनामिका ताम्रकार सहित अनेक शिक्षक-शिक्षिकाएँ, साहित्यप्रेमी एवं गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।सभी ने आयोजन की गरिमा की सराहना करते हुए लेखक के साहित्यिक योगदान को महत्वपूर्ण बताया।

पुस्तक के बारे में

‘मुझको भी जीने की वजह दे दे’ डॉ. अजय आर्य का एक संवेदनशील और विचारोत्तेजक काव्यसंग्रह है, जिसमें प्रेम को उसके व्यापक और मानवीय स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है।इस संग्रह में कुल 43 कविताएँ संकलित हैं, जो ‘तेरे होने की रोशनी’ से आरंभ होकर ‘मजबूरी’ पर समाप्त होती हैं।इन कविताओं में प्रेम के साथ-साथ बिछोह की पीड़ा, प्रतीक्षा की वेदना, स्मृतियों की ऊष्मा और आत्मसंयम की शांति का गहन चित्रण मिलता है।

कविता संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें प्रेम को केवल भावुक अनुभूति के रूप में नहीं, बल्कि जीवन को समझने और संभालने की शक्ति के रूप में देखा गया है। कविताएँ पाठक को आत्मसंवाद के लिए प्रेरित करती हैं और उसे अपने भीतर झाँकने का अवसर देती हैं।भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और संवेदनात्मक है, जो सीधे पाठक के मन से संवाद करती है।
यह काव्यकृति अमृत कलश प्रकाशन, पंजाब से प्रकाशित हुई है और प्रेम, संवेदना तथा मानवीय मूल्यों पर आधारित समकालीन हिंदी कविता में एक महत्वपूर्ण योगदान मानी जा रही है।