हमारे बारे में
छत्तीसगढ़ प्रदेश का एक विश्वसनीय न्यूज पोर्टल है, जिसकी स्थापना देश एवं प्रदेश के प्रमुख विषयों और खबरों को सही तथ्यों के साथ आमजनों तक पहुंचाने के उद्देश्य से की गई है।
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(लेखन एवं संकलन: नितिन सिंघवी)रायपुर। मैं अभी युवा बाघ हूँ। नाम मेरा “बीजापुर टाइगर” रख दिया गया है। 29 जुलाई अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस है, उससे एक दिन पहले मैं अपनी कहानी खुद सुनाना चाहता हूँ। आप ही बताइए, मैं भाग्यशाली हूँ या दुर्भाग्यशाली?
फंदे में फंसी जिंदगी
मार्च 2025 की बात है, तारीख मुझे याद नहीं। मैं छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर के बीजापुर के घने जंगलों में मस्त घूम रहा था। उसी जंगल में शिकारियों ने लोहे के तार का फंदा बिछा रखा था। मेरे पीछे के दोनों पैर उसमें फंस गए। जख्म गहरा होता गया। मवाद और कीड़े पड़ गए। दर्द इतना कि चीख भी न निकलती थी।
कुछ दिन बाद एक शिकारी भाला लेकर मुझे मारने आया। अपनी जान बचाने के लिए मैं उस पर झपटा और वह वहीं ढेर हो गया। ग्रामीणों ने वन विभाग को बताया कि जंगल में एक घायल बाघ है। कुछ अधिकारियों ने आरोपों से बचने के लिए कह दिया कि “शायद पत्थरों के बीच पैर फंस गए होंगे”।
खैर, मुझे रेस्क्यू किया गया और 16 अप्रैल 2025 को रायपुर के जंगल सफारी में लाया गया। 30 जुलाई को मेरी सर्जरी हुई। मुझे सबसे अलग रखा गया। सिर्फ केयर टेकर आता है ताकि मैं इंसानों का आदी न हो जाऊँ। धीरे-धीरे घाव भरा, जीने की उम्मीद जगी।
रिपोर्ट आई, उम्मीद जगी, फिर टूट गई
नवंबर तक मैं लगभग ठीक हो गया। चार डॉक्टर आए। जांच के बाद रिपोर्ट बनी। केयर टेकर से लेकर मैंने खुद पढ़ी। उसमें लिखा था – “बाघ स्वस्थ है, सर्जरी का चीरा भर गया है, बाल आ गए हैं। ऑपरेशन वाले पैर पर पूरा भार डाल सकता है, दौड़ सकता है। केवल कभी-कभी हल्की लंगड़ाहट है, जो समय के साथ ठीक हो जाएगी।”
डॉक्टर आपस में कह रहे थे कि पहले मुझे बड़े बाड़े में “सॉफ्ट रिलीज” के लिए रखा जाएगा। वहां शिकार और जंगल में रहने की क्षमता परखी जाएगी, फिर मुझे जंगल में छोड़ दिया जाएगा।
उस दिन मैं खुशी से उछल पड़ा। लगा अब आजाद हो जाऊँगा। केयर टेकर ने कहा “बड़े साहब के आदेश का इंतजार है”। हर आहट पर लगता आदेश आ गया, पर आदेश नहीं आया।
फाइलों में उलझा मेरा भविष्य
केयर टेकर ने बताया साहब लोग “इको-टूरिज्म, विकास और रोजगार” में व्यस्त हैं। मैंने खाली समय में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम पढ़ा। उसमें इको-टूरिज्म जैसा एक भी शब्द नहीं था।
दो महीने बाद साहबों को याद आया कि यहां एक टाइगर भी है। फरवरी 2026 में देहरादून के WII को पत्र लिखा गया कि “डॉक्टरों ने सुझाव दिया है कि रिलीज से पहले विशेषज्ञ जांच करें”। मैंने अपनी रिपोर्ट 10 बार पढ़ी। उसमें ऐसा कोई सुझाव नहीं था। समझ नहीं आया डॉक्टरों के नाम पर यह बात कहां से जोड़ दी गई।
वन्यजीव प्रेमियों ने भी चिट्ठी लिखी। न रिमाइंडर गया, न विशेषज्ञ आए। महीने बीतते गए। फिर कहा गया मुझे “सॉफ्ट रिलीज बाड़े” में रखा जाए। जवाब आया – ऐसा बाड़ा सिर्फ अचानकमार में है, वहां जगह नहीं है। नया बाड़ा बनाने की कोई तैयारी नहीं।
जून में नए साहब आए। 24 जून को फिर WII को पत्र गया। अगले ही दिन सलाह आ गई कि “4 विशेषज्ञों की समिति बना दो”। जो विभाग 3 महीने तक चुप था, उसने एक दिन में सलाह कैसे दे दी, यह आज भी रहस्य है। समिति बनी, पर आज तक मुझसे मिलने नहीं आई। 2 दिन पहले वीडियो कॉन्फ्रेंस हुई। केयर टेकर कह रहा था “छोड़ने की संभावना नकारात्मक है”।
सबसे बड़ा सवाल
इधर अखबारों में पढ़ा कि साहब लोग पड़ोसी राज्य से तीन बाघ लाने की तैयारी कर रहे हैं। मेरा दिल बैठ गया। अपने घर के बाघ को तो आजाद नहीं कर रहे, बाहर से तीन लाने की बात हो रही है।
विशेषज्ञ कहते हैं, बाघ जितने दिन इंसानी संपर्क में रहता है, उसके जंगल में लौटने की संभावना उतनी कम होती है। मुझे फंदे में फंसे 15 महीने हो गए। स्वस्थ घोषित हुए 7 महीने हो गए। मैं कैद में जिंदा हूँ।
उसी बीजापुर और आसपास में पिछले कुछ महीनों में 4-5 बाघों का शिकार हो चुका है। केयर टेकर बताता है वहां अब सिर्फ एक बाघ बचा है। अगर मैं जंगल में होता तो शायद मेरा भी शिकार हो गया होता।
अब आप ही बताइए… मैं यहां कैद में भाग्यशाली हूँ या दुर्भाग्यशाली?
नोट: इस लेख में वर्णित घटनाएँ वास्तविक हैं तथा तथ्य उपलब्ध अभिलेखों पर आधारित हैं।